ओलंपिक पदक
बाधाओं से अपनी लड़ मंजिल जो पा जाते है ,
आग हवा पानी से भी नहीं वो घबराते है ।।
टूटी चप्पल सर पर खप्पर ख्वाब आसमान ले जाते है ,
सच मानों बाधाओं से अपनी लड़ मंजिल वही पाते है ।।
हर रोज एक रेस नई है हार से नहीं घबराते है ,
टूटे जो होंसले कभी ख्वाबों से फिर पँख नए चुराते है ।।
नई चेतना , नया सवेरा उम्मीद नई फिर आई है ,
ओलंपिक की इस नवल बसन्त की सबको खूब बधाई है ।।
हार जीत की नहीं रेस ये राष्ट्र सम्मान की बेला है ,
पैरों में ख्वाब बांध लें सोच तू ही रेस का घोड़ा है ।।
सच मानों बाधाओं से अपनी लड़ मंजिल यही पाते है बाधाओं से अपनी लड़ मंजिल यही पाते है ।।
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